भोपाल। मैंने कसम खाई थी कि फोक आर्ट को लोगों के मुंह से डाइंग (मरा हुआ) नहीं कहने दूंगा…। इसलिए मैं अपने देसी अंदाज में ही अपना संगीत प्रस्तुत करता हूं और करता रहूंगा। मुझे खुशी है कि फोक संगीत का वापस दौर लौटा है। खासकर कोविड में लोगों ने शांति की तलाश में लोक संगीत ही सुनना पसंद किया है।

 

यह कहना है राजस्थानी लोक गायक (rajasthani folk singer) मे खां का। मामे खान ने पत्रिका से बातचीत में कहा कि लोकगीत हो या शास्त्रीय संगीत, जो फिल्मों में भी गाए जाते हैं उन्हें यूथ सुनते हैं और पसंद भी करते हैं। इसलिए मुझे नहीं लगता कि यूथ फोक म्यूजिक पसंद नहीं करता। बल्कि कुछ ज्यादा ही पसंद करता है।

 

तरक्की के बावजूद मेरा म्यूजिक वही है

उन्होंने कहा कि तरक्की के बाद जीवन में बदलाव आया है लेकिन मेरा म्यूजिक वही है। हां पहनावा जरूर बदल गया है। स्टेज पर परफॉर्म करते समय राजस्थानी पहनावे में पगड़ी पहन कर ही प्रस्तुति देता हूं, लेकिन अब मीडिया की मेहरबानी से कुछ लोग मुझे जानने लगे हैं इसलिए बाकी समय में साधारण रूप में ही रहता हूं।

फिल्म लक बाय चांस से इंडस्ट्री में संगीत की दुनिया में कदम रखने वाले मामे खान का कहना है कि रियालिटी शो में जरूरी नहीं कि विनर ही सबसे उम्दा गायक हो। कई बार जो जीत नहीं पाते वो काफी ज्यादा मंजे हुए कलाकार होते हैं। मामे खान रविवार को रबींद्र नाथ टैगोर यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित विश्वरंग उत्सव में प्रस्तुति देने आए थे।

 

शंकर महादेवन ने मौका दिया

उन्होंने कहा कि मैं ईला अरुण की बेटी की शादी में गाना गा रहा था। तभी शंकर महादेवन ने मुझे सुना और फिर कुछ दिनों बाद मुझे अपने स्टूडियो बुलाया। तब उन्होंने लक बाय चांस फिल्म के लिए मुझे बुलाया। मैं अपने देसी अंदाज में ही गया, वहां जोया अख्तर भी बैठी थीं और उन्होंने गाने को कहा, तो मैंने अपने देसी अंदाज में बावरे… गाया, मेरे गाने को वे सुनते रह गए। रिकार्ड करना भूल गए, फिर दोबारा मुझसे वो गाना गवाया। फिर कुछ सालों बाद उसी फिल्म के लिए पेपर में मेरा नाम आया, जिसे मेरे दोस्त ने घर आकर दिखाया।

 

म्यूजिक में बदलाव आटे में नमक के सामान है

उन्होंने कहा कि म्यूजिक में बदलाव आटे में नमक के सामान है। मैंने भी राजस्थानी म्यूजिक में कुछ बदलाव किया है। जैसे रूट तो वही रहती है, लेकिन शाखाओं में बदलाव आ सकता है। जैसे मैंने केसरिया बालम आयो रे … जिसमें 6 से 7 बीट थे। जिसे मैंने 2015 में कुछ नया करके प्रस्तुत किया था, इसके लिए अवार्ड भी जीता।

 

 

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25 वर्षों से मेरा भोपाल से नाता है

25 साल से भोपाल से कनेक्शन के बारे में उन्होंने कहा कि मेरे पिताजी वालिद साबह भोपाल के ड्रामा इंस्टिट्यूट से जुड़े थे और उन्हीं के साथ मेरा आना-जाना लगा रहा। इसलिए 25 वर्षों से मेरा भोपाल से नाता है।

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