भोपाल. जैसे रस्सी में सांप का भ्रम होता है, जिसमें रस्सी वास्तविक है उसी प्रकार ब्रह्म में माया के कारण पंचभूतों का, जगत का भ्रम होता है किंतु ब्रह्म सत्य है। एक अन्य उदाहरण से समझें तो जैसे कढ़ाई में कोई आकृति बनाई जाती है तो वो सभी आकृतियाँ वास्तविक नहीं हैं, केवल वास्तविक जैसी दिख सकती हैं। वास्तविक तो केवल कॉटन ही है। यह बातें चिन्मय मिशन, नोएडा के आचार्य स्वामी चिद्रूपानंद सरस्वती ने पंचभूत विवेक विषय पर दिए व्याख्यान में सरल शब्दों और उदाहरणों से समझाई। आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास, संस्कृति विभाग, मध्य प्रदेश शासन द्वारा रविवार को शंकर व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया।

पंचभूत माया के विकार हैं, सत्य केवल ब्रह्म है

स्वामीजी ने बताया कि सत्य को जानने के कई तरीके हैं, पंचभूत विवेक भी ब्रह्म को समझने का ही एक माध्यम है। पांच भूत हैं – आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। संसार में जो भी दिखता है वह इन्हीं पांच भूतों से बना हुआ है। जगत की सृष्टि से पूर्व केवल सत ही था। सारे जगत में नाम और रूप ही है जो माया द्वारा भूत प्रपंच के माध्यम से गढ़ा जाता है।

सरल उदाहरणों से समझाया वेदान्त

स्वामीजी ने उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि जिस प्रकार हम दीवार पर रंग पोतते हैं, उसी प्रकार माया ब्रह्म को ढँक देती हैं। पंचभूत माया के ही विकार हैं। जैसे स्वप्न में दिखा हाथी सत्य नहीं है उसी प्रकार इस जगत में दिखने वाले पंचभूत भी सत्य नहीं हैं। इनकी सत्ता ब्रह्म से ही है। इसी प्रकार पंचभूत विवेक होने पर हम माया से भ्रमित नहीं होते। इसीलिए वेदान्त में कहा है ब्रह्म ही सत्य है, जगत मिथ्या है। मैं ही सत हूँ। इस व्याख्यान का लाइव प्रसारण न्यास के यूट्यूब चैनल और फेसबुक पेज पर किया गया।

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